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धनतेरस 2026: पूजा विधि, महत्व और शुभ खरीदारी
धनतेरस, जिसे धनत्रयोदशी भी कहा जाता है, कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को मनाया जाता है और इसी दिन से दीपोत्सव का शुभारंभ होता है। वर्ष 2026 में धनतेरस 6 नवंबर को है। यह पर्व स्वास्थ्य, समृद्धि और घर में शुभ ऊर्जा के स्वागत का प्रतीक है।
धनतेरस का महत्व
पौराणिक मान्यता है कि समुद्र मंथन के समय भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए। वे आयुर्वेद के देवता माने जाते हैं, इसलिए इस दिन अच्छे स्वास्थ्य और दीर्घायु की प्रार्थना की जाती है। साथ ही माता लक्ष्मी और धन के रक्षक भगवान कुबेर की पूजा कर घर में सुख-समृद्धि और स्थिरता की कामना की जाती है।
सायंकाल की सरल 5-चरण पूजा विधि
1. स्वच्छता और स्थापना: घर व पूजा स्थान साफ करें, चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाकर भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और कुबेर का चित्र या प्रतीक रखें। जल से भरा कलश स्थापित करें। 2. संकल्प: हाथ में जल और अक्षत लेकर अपने नाम, स्थान और उद्देश्य के साथ संकल्प लें। 3. दीप प्रज्वलन: घी या तेल का दीपक सुरक्षित स्थान पर जलाएँ और धूप अर्पित करें। 4. पूजन: रोली, अक्षत, गेंदे के पुष्प, मिठाई और नैवेद्य अर्पित करें। धन्वंतरि से आरोग्य और लक्ष्मी-कुबेर से समृद्धि की प्रार्थना करें। 5. आरती और प्रसाद: श्रद्धा से आरती करें और परिवार में प्रसाद बाँटें।
शुभ खरीदारी की परंपरा
धनतेरस पर पीतल, तांबे या स्टील के बर्तन, झाड़ू, दीपक अथवा धनिया खरीदने की प्रथा है। सोना या चाँदी खरीदना शुभ माना जाता है, पर केवल अपने बजट के भीतर ही खरीदें। खरीदारी पूजा की अनिवार्य शर्त नहीं है; श्रद्धा और कृतज्ञता ही मुख्य हैं।
यम दीपदान
धनतेरस की शाम घर के मुख्य द्वार के बाहर दक्षिण दिशा की ओर चार मुख वाला दीपक जलाकर यमराज के निमित्त दीपदान किया जाता है। यह परिवार की रक्षा और अकाल भय से मुक्ति की प्रार्थना का प्रतीक है।
पूजा का समय
प्रदोष काल और पूजा मुहूर्त हर शहर में सूर्यास्त के अनुसार अलग होते हैं। सटीक समय के लिए अपने शहर का सत्यापित पंचांग अवश्य देखें। क्षेत्र और कुल-परंपरा के अनुसार विधि में भी अंतर हो सकता है।
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